STORYMIRROR

दयाल शरण

Abstract

4  

दयाल शरण

Abstract

दिखावा

दिखावा

1 min
449

मन से जो

संग छोड़ चुके हैं

अपने और

पराये लोग

रिश्तों को

भरमाने आये

बेबस और

बेचारे लोग।


हल्दी, कुम-कुम,

मेंहदी, बिछिया,

और सिंदूर

रिश्तों को

भरमाने आये

बेबस और

बेचारे लोग।


मन में 'मैं' हूँ

बाहर 'हम' फिर

रिश्तों का 

बाजार लिए

रिश्तों को

भरमाने आये

बेबस और

बेचारे लोग।


कुंठा, कड़वाहट

पर लाचारी

वट वृक्ष तले

जो वृक्ष पले

धूप को फिर

भरमाने निकले

घर में बैठे-बैठे लोग।


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Abstract