स्वयं
स्वयं
1 min
14
खुद से नाराज़ जरा रहता है
वो खुद के आस पास रहता है
बुदबुदाता है खुद से बाते करता है
जमाने से कटा कटा सा रहता है
जाने विरासत क्यूं ढोया करता है
भीड़ से पिछड़ा पिछड़ा रहता है
कभी कीचड़ की छाप पड़ती है
कोस के खुद से बदला लेता है
भीगी पलकें छुपाए रखता है
कोई सिसकी दबाए रखता है
जलाने को सौ घर कम हैं
जिस्म में शोला जलाए रखता है
देखना है कि खुद से जीतता कब है
देखते है कि खुद पे मुस्कुराता कब है
जुबा नीली है सौ गरल पी के बैठा है
देखते हैं कि वो और जीतता कब है
खुद से नाराज़ ..........
वो खुद के आस पास.......
