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दयाल शरण

Others

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दयाल शरण

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स्वयं

स्वयं

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खुद से नाराज़ जरा रहता है

वो खुद के आस पास रहता है

बुदबुदाता है खुद से बाते करता है

जमाने से कटा कटा सा रहता है


जाने विरासत क्यूं ढोया करता है

भीड़ से पिछड़ा पिछड़ा रहता है

कभी कीचड़ की छाप पड़ती है

कोस के खुद से बदला लेता है


भीगी पलकें छुपाए रखता है

कोई सिसकी दबाए रखता है

जलाने को सौ घर कम हैं

जिस्म में शोला जलाए रखता है


देखना है कि खुद से जीतता कब है

देखते है कि खुद पे मुस्कुराता कब है

जुबा नीली है सौ गरल पी के बैठा है

देखते हैं कि वो और जीतता कब है


खुद से नाराज़ ..........

वो खुद के आस पास.......



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