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Gazala Tabassum

Abstract

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Gazala Tabassum

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दीदार

दीदार

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चाह कर भी तुझे , दीदार न पाना तेरा

मह़वे ह़ैरत है ज़माने से , ज़माना तेरा


लज़्ज़तें मिलने लगी अब तो गुनाहों में तुझे

अब तो मुश्किल है बहुत राह पे आना तेरा


धूप आ आ के मुंडेरों पे हँसा करती थी

ख़ूबसूरत था बहुत घर वो पुराना तेरा


चुप रहेगी ये ज़ुबाँ और नज़र भी जब तक

साथ भी देगा तभी तक ये ज़माना तेरा


छोड़ कर मेरा चमन अब न परिंदे जाना

दिल को भाता है बहुत शोर मचाना तेरा


ज़ख़्म लफ़्ज़ों के अभी सूख नहीं पाए थे

आज फिर खल गया एह़सान जताना तेरा


तेरी किस्मत में कोई घर ही नहीं है औरत

इस जहां में नहीं कोई भी ठिकाना त


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