धन का महात्म
धन का महात्म
धन कमाना जीवन का
ध्येय बना जब जाना
बिना धन के कोई
कुछ भी नहीं
धन नहीं तो
भूख अधूरी
प्यास अधूरी
लगता हे संसार अधूरा
ना होता परिवार
ना होते रिश्तेदार
धन से होती सब इच्छा पूरी
ये ऊँची ऊँची इमरातें
सीमेंट कंक्रीट के जंगल
बड़ी बड़ी गाड़ियां
बड़े बड़े घर
धन ना होता
कुछ भी ना होता
ना दोस्त होते
ना दुश्मन
जेब मैं धन नहीं तो
सब जहाँ लगता सुना सुना
ना प्रेमी प्रेमिका होते
ना सरकार ना दरबार
ना करता कोई किसे प्यार
ना होती किसी को
प्यार की दरकार
धन ही हे सब बातों की जड़
करते लोग धन
देखकर व्यवहार
किस की जेब में कितना धन
करता सब उस पर निर्भर
सब कुछ बिकता
सब कुछ खरीदता होता जब धन
इसी धन के लिए करता
मानव दुनिया भर के जतन
मारता एक दूसरे का धन
फिर भी नहीं भरता उसका मन
सुबह शाम रात को
घिसता पिटाता मरता
कमाने के लिए ये धन
जोड़ता थप्पयां जमाता
जैसे भी मिलता ये धन
धन की महिमा ये सारी
जब तक हे संसारी
पृथ्वी पर पशु पक्षी भी जीते
बिना धन के आनंद से रहते
नहीं किसी से लड़ते झगड़ते
नहीं किसी पर डाका करते
ईश्वर ने शरीर सभी को दिया
शरीर मैं पेट भी दिया
पेट अन्न से भरता
भूसे पेड़पतित्तियों
फल फूल कंद मूल से
भी भरता जीने के लिए
इंसान को रोटी कपड़ा
और मकान चाहिए
पेट भरने को दो रोटी
तन ढकने को दो कपडे
रहने को घर
फिर कितना धन चाहिए
क्यों दिन रात की मेहनत
करता तिजोरियां भरने के लिए
धन का संचय धन का
अपव्यय करता इंसान
किसी को ज्यादा
किसी को कम देता
लूट खसोट का फरमान
एक रहता झोपडी
एक रहता महल
यही करता इंसान को
इंसान से अलग
इस सबका मूल होता
धन धन धन।
