धागे
धागे
धागे ये मन के
देखो कैसे उलझे
अनचाहे रिश्तो में जकड़ के
रह गए कच्चे बंधन सबके
जुडे तो गांठ दिखें
फिर भी मन में आस जगे
कहीं मिले दीवाने
फिर होकर बेगाने
ना टूटी डोर ना छुटी सांसे
फिर क्यों हुए फासले
बस यही पूछें
उलझे मन के धागे।
