देता है ये सीख पलायन
देता है ये सीख पलायन
प्रिय डायरी में अनुभव अपना
था दहल गया दिल और सिहर उठा मन,
गांवों की ओर पलायन टी वी पर वह दृश्य निहार।
उल्लंघन कर लाक डाउन निर्देशों का,
शहरों से उमड़ पड़ा था जन समूह अपार।
सम्भवतः अठ्ठाईसवीं तिथि थी अप्रैल माह की,
लाक डाउन के बीतेंगे आज सिर्फ दिन चार।
पूर्ण दिलासा नहीं मिल पाने से टूटा सब्र,
भागे सब ले लेकर के अपने बच्चे और परिवार।
शहरों की ऊंची अट्टालिकाएं और सुंदर भवन इन्होंने की बनाएं थे,
निर्माण सड़कों- मेट्रो-फ्लाई ओवर के,इनके पसीने से बन पाए थे।
सर्दी-गर्मी-बारिश को इन सबने खुले नभ तले या झोपड़ियों में झेला था,
विपदा के क्षण आने पर, महल प्रदाताओं ने पाया खुद को असहाय अकेला था।
परिजन जन्मभूमि सब छोड़ -छाड़ पलायन करके आए थे छोड़ प्यार,
विकसित न हुए स्थानीय संसाधन जब, भागे पाने शिक्षा- रोजगार।
मजबूर हुए उल्टे पलायन को,जब देखी जीवन- जीविका पर तलवार,
थे कष्ट अनेक ही भोग रहे, सजा रहे स्वर्णिम सपनों का निज संसार।
पथ में पाए होंगे अनगिनत कष्ट,जिनका न होगा कुछ पारावार,
निज क्षेत्र जो विकसित हो जाए ,तो न करेंगे वापसी का फिर से विचार।
डिग्री के संग -संग ज्ञान मिले, हो योजनाओं के प्रति जागरूकता का प्रचार,
फाइलों से आगे बढ़कर कार्यान्वयन हो इनका ,पलायन रुक मिले सबको रोजगार।
