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वैष्णव चेतन "चिंगारी"

Tragedy Children

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वैष्णव चेतन "चिंगारी"

Tragedy Children

देखा नहीं जाता( 2 )

देखा नहीं जाता( 2 )

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ऐसा बचपन देखा नहीं जाता,

रोता-बिलखता व सिसकता,

मैले -कुचले अधनंगे कपड़ों में,

बचपन जीत वो अभावों में,

सड़क किनारे फुटपाथ पर,

गुजर-बसर करता हुआ,

कोई दूध को तरसता,

कोई भूख को तरसता,

कोई माँ के आँचल को तरसता,


ऐसा बचपन देखा नहीं जाता,

शिक्षा पाने की उम्र में,

स्कूलों में जाने की बजाय,

घर-खेत और फैक्टरियों में,

वो करता हैं मज़दूरियाँ,

बचपन बना बाल बंधुआ मजदूर,

पीढ़ी दर पीढ़ी यूं ही सह रहा है,

अपने अनुभवों में जी रहा हैं,

वो अपने आक्रोश को पी रहा हैं,

तभी तो मासूम बन रहें हैं बाल अपराधी,

ऐसा मंज़र देखा नहीं जाता,

अभावों में जीता हुआ ,

ऐसा बचपन देखा नहीं जाता !!

      


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