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लाल देवेन्द्र कुमार श्रीवास्तव

Tragedy

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लाल देवेन्द्र कुमार श्रीवास्तव

Tragedy

चिंता की लकीरें

चिंता की लकीरें

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हर तरफ़ छाया हुआ है अंधेरा,

खौफ़नाक मंजर ने बनाया घनेरा !

माथे पे मेरे खिंची चिंता की लकीरें,

तम से ढका दिनमान हो न सवेरा !


राह चलते हुए अब लगता है डर,

इंसानियत पर हर जगह है कहर !

इंसान घुट घुट कर बस! जी रहा,

आतंक का माहौल है हर शहर !


सुनसान सड़कों पर न आवाजाही,

अनजान सा इक खौफ़ की गवाही !

महिलाओं के चेहरे पर डर है समाया,

घर से बाहर लगे काली सी स्याही !


लोकतंत्र का पहरा हुआ कमजोर है,

बस! दिखावे का ही महज़ शोर है !

चीत्कार न सुनाई देते हैं अब उन्हें,

सत्ता के लिए वोट पर बस जोर है !


हमारे मस्तिष्क में अंकित चिंता यही,

कब क्या हो जाए समाज में भी कहीं !

लूटखसूट बेईमानी का है बोलबाला,

इस तंत्र का ढांचा अब कैसे हो सही।


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