चिंता की लकीरें
चिंता की लकीरें
हर तरफ़ छाया हुआ है अंधेरा,
खौफ़नाक मंजर ने बनाया घनेरा !
माथे पे मेरे खिंची चिंता की लकीरें,
तम से ढका दिनमान हो न सवेरा !
राह चलते हुए अब लगता है डर,
इंसानियत पर हर जगह है कहर !
इंसान घुट घुट कर बस! जी रहा,
आतंक का माहौल है हर शहर !
सुनसान सड़कों पर न आवाजाही,
अनजान सा इक खौफ़ की गवाही !
महिलाओं के चेहरे पर डर है समाया,
घर से बाहर लगे काली सी स्याही !
लोकतंत्र का पहरा हुआ कमजोर है,
बस! दिखावे का ही महज़ शोर है !
चीत्कार न सुनाई देते हैं अब उन्हें,
सत्ता के लिए वोट पर बस जोर है !
हमारे मस्तिष्क में अंकित चिंता यही,
कब क्या हो जाए समाज में भी कहीं !
लूटखसूट बेईमानी का है बोलबाला,
इस तंत्र का ढांचा अब कैसे हो सही।
