STORYMIRROR

Rajiv Jiya Kumar

Abstract Romance

3  

Rajiv Jiya Kumar

Abstract Romance

चाँद

चाँद

1 min
172

सुबह की किरण 

निखर बिखर रही है,

हवा भी ठहर सिहर 

राग पर अपने 

थम थम कर

थिरक रही है,

थिरकती फिज़ा है,

थिरक रहा है मन

थिरकता तन,

सजन तुम तभी

मुंडेर पर नजर आए

बस भरमाए 

चाँदनी चाँद की

लहर लहर लहराती

गुन गुन गुनगुनाती

लोरी गाती

फिर से सब सजाती

नजर आ रही है।।

     



Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Abstract