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Mohanjeet Kukreja

Romance

4.8  

Mohanjeet Kukreja

Romance

चाहत!

चाहत!

1 min
201


तुझे ना चाहने की मेरी चाहत ना कभी पूरी हुई

कौन सा इकलौती ख़्वाहिश थी जो ना पूरी हुई !


कितने ही क़दम बढ़ा के देख लिए तेरी जानिब 

न जाने क्यों ना कम दिलों के दरमियाँ दूरी हुई !


पूरा होना ना लिखा था मोहब्बत की तक़दीर में

किसी के साथ आधी और कहीं यह अधूरी हुई !


ना आओ जो ख़्वाब में, नींद मुकम्मल होती नहीं

गोया यह भी कोई लत है जो इतनी ज़रूरी हुई !


सिर्फ़ रूठे हुए होते तो बे-शक मना भी लेते तुम्हें  

हमसे तो तमाम उम्र ना किसी की जी-हुज़ूरी हुई !


जानिब: ओर, तरफ़; दरमियाँ: बीच;

मुकम्मल: पूरी; जी-हुज़ूरी: हाँ में हाँ मिलाना



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