चाहत
चाहत
कितना चाहा तुझे मगर मेरी चाहत काम ना आई।
दर-ब-दर भटकता फिरा पर तेरी याद ना भुलाई गई।।
सुना है दुनिया में तू है जैसे प्राणों के लिए वायु।
पर किसी भी प्राणी में तुझ सी सूरत ना दिखाई गई।।
जो भी नजर आया यहां वह ना था हमसफर अपना।
जो भी था अपना वो आज तक नजर ना आई ।।
इस समाज ने बिठा कर किए अनेकों वादे।
हो गई जब तू दूर मुझसे तेरी शरारतें याद आई।।
पूछ कर देखा फलक चाँद सितारों तक से।
पर किसी ने भी तेरे बारे में सही राह ना दिखलाई।।
ढल गई उम्र तेरी राह में चलते -चलते।
पड़ गए पाँव में छाले लेकिन समाज को तरस न आई ।।
जब हो गई खाक खुदी शम्मा से जलते -जलते ।
तब कहीं जाकर के तेरे इश्क की तरंग दिखलाई ।।
कभी -कभी ऐसा लगा कि तुझ में -मुझ में कोई फर्क नहीं ।
लिया जो नाम तेरा दिल में तू उतर आई ।।

