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Shakuntla Agarwal

Tragedy

5.0  

Shakuntla Agarwal

Tragedy

बुढ़ापा

बुढ़ापा

1 min
312


यौवन के मद में इतरा रहा था मैं,

यूँ कहो इठला रहा था मैं !

आईने ने सच का अक्स दिखलाया,

तो जान पाया,

यौवन फ़िसल रहा इस तरह,

मुठ्ठी में रेत हो जिस तरह !


आँखें गड़ी की गड़ी रह गयी,

जैसे ही देखा,

सफ़ेद बालों की छड़ी लग गयी,

सोच में पड़ गया बुढ़ापा कैसा होगा,

बैत लेकर हाथ में चलना होगा !


जिनकी ऊँगली पकड़

चलना सिखलाया,

उन्हीं से हर पल डरना होगा !


दास्तानें - किस्से सुनने को,

कोई न अपना होगा !

तकिये पर सर रखकर,

सुबकना होगा !


सिसकने को न कोई कंधा होगा !

जिस मकाँ को घर बना सजाया,

उस घर के कोने में

अपना बिछौना होगा !


होने को तो घर के कोने में

रोशनी होगी,

पर दिल के कोने में

घोर अँधेरा होगा !


गुफ्तगूँ करना चाहेंगे

हम अपनों से तो,

डोकरा सठिया गया

ये सुनना होगा !


मुखिया हैं हम

घर के "शकुन",

मुखाग्नि कब मिले

इसके लिए तरसना होगा !


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