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Satyendra Gupta

Abstract

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Satyendra Gupta

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बतलाऊँ एक राज की बात

बतलाऊँ एक राज की बात

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बतलाऊँ एक राज की बात

माता पिता बहुत मन्नतों से

पुत्र पाते है

उन्हें पालते, पढ़ाते, लिखाते

उन्हें बड़ा करते है

जब बेटा कुछ बन है जाता

तो वही कहता कुछ नही किया मेरे लिए

कहकर खत्म कर देता उनके जज्बात

बताऊं एक राज की बात।


शहर में रहने के बाद कोई शहरी बन जाता है

गांव उनके लिए अब बेकार हो जाता है

जिस आंगन में खेलकर बड़ा हुआ

वो आंगन अब गंदा लगने लग जाता है

जब आता है करोना तब गांव याद आता है

याद आते है गांव की बात

बतलाउ एक राज की बात।


बचपन गुजार देते है यू ही

पढ़ने की उम्र में समय गवा देते है यू ही

उम्र ठहरता है कहा़ गुजर जाता है यू ही

समय गुजरने पे पछताते है यू ही

तब याद आती है कर लेते कठिन परिश्रम

याद आने लगते है गवाए हुए पुराने याद

बतलाऊ एक राज की बात।


जब रहते है अच्छे समय

देता है सब साथ

हर कोई आकर जोड़ता है 

एक रिश्ता मेरे साथ

बुरा समय आते ही

हो जाते है सब दूर

यही है दुनिया की दस्तूर

अपने आप को समझ लो

तभी दुनिया समझेगी आपकी बात

बतलाऊ एक राज की बात।


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