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Dr. Vijay Laxmi"अनाम अपराजिता "

Romance

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Dr. Vijay Laxmi"अनाम अपराजिता "

Romance

बसंत ऋतु बेला

बसंत ऋतु बेला

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सखी शिशिर विगत बसंत ऋतु आई 

बौरों से सजी अमराई मादकता छाई 

बूढ़े तरु में तड़क छलक रही तरुणाई 

मन्मथ ने साध पंच पुष्पायुधबान चलाई


टेसू , कुरवक, सिन्दूरी रंग रहे बिखेर 

चंपक, शिरीष, अमलतास हैं बड़े घनेर

चटकीं कलियां सेमल, गेंदा है चहुं ओर 

शारदे का उपहार बसंत नवऊर्जा संचार 


अगणित सुमन खिले रंगारंग बहुभांती

मानो फूलन की होली खेलें कामाराती 

सजन रहें पुकार,स्वदेश लौटे खग पाती

रति मदन शोभित ऐसे जैसे दिया बाती।

    


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