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Vikash Kumar

Tragedy

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Vikash Kumar

Tragedy

(बदलाव आ रहा है)

(बदलाव आ रहा है)

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हर पाँच साल में बदलाव की लहर आ रही है,

जनता खुश है सरकार अब बदलाव ला रही है,


भगवान हो गईं सरकारें, जनता महन्त हो गई,

अर्पण खुद को करने की होड़महोड़ हो गई,


जो भूखे हैं उनको रोटी की तरस आज भी बाकी है,

महंतों के घरों में झांको, सूरज से ज्यादा उजियारी है,


जिनके घरों में अंधियारा, अब भी अंधियारा रहता है,

सरकारें कितनी बदल गईं, उजियारा नसीब ना होता है,


बदलाव अगर लाना चाहो, सत्ताओं को पैगाम लिखो,

घोर गरीबी अशिक्षा को, लोकतंत्र का दाग लिखो,


यह गैरत ऐसी है जिस पर, चंद समाज इतराता है, 

सत्ताओं की चाभी बनकर, मनचाहा नाच नचाता है,


जिसको बुनियादी बातों पर, गुस्सा तनिक ना आता है,

हिन्दू मुस्लिम करने में, जिसका मन ना घबराता है,


गद्दार बड़ा है, कपटी है, जन जन का वह हत्यारा है,

रोटी कपड़ा और मकान का हन्ता है, मति का मारा है।


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