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Madhu Vashishta

Tragedy

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Madhu Vashishta

Tragedy

बचपन के आम

बचपन के आम

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बचपन की यादों मैं याद आते हैं वह आम। 

घर की बाल्टी में भीगे थे रहते 

उसे समय फ्रिज का कहां था काम? 

मां दादी, चाची मिलजुल कर डालती थी आम का अचार। 

आम की लौंजी और आम का पन्ना, हर समय मिलता था तैयार। 

हम भी अमरुद और आम के पेड़ पर बचपन में चढ़ा करते थे। 

बंदर था हमारे साथ बैठता हम उनसे कब डरा करते थे। 

आज संयुक्त परिवार कहां रहे? कहां रहे वह पुराने आम?

आज जमाना ऐसा आया 

रिश्ते ही हो गए तमाम।

बहुत खास था वह जमाना 

जब दोस्तों के साथ पेड़ों पर चढ़कर तोड़ते थे आम।

दोपहर की गर्मी तब तंग नहीं करती थी, 

पैरों पर नहीं लगता था घाम। कूलर एसी तब क्या जाने 

पंखों का भी नहीं था काम। 

पेड़ों के नीचे गिरे हुए जामुन,फल और आम थे चुनते।

दूर-दूर तक हरियाली तब थी तमाम। 

याद आते हैं वह बचपन के जमाने, 

बहुत खास थे तब वह आम।


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