बौछारे बारिसकी उड़ रही। छाते खुलके यहीं तही फैल गए।
बौछारे बारिसकी उड़ रही। छाते खुलके यहीं तही फैल गए।
बौछारें बारिश की उड़ रही।
छाते खुल के यहीं तही फैल गए।
बच्चे दौड़कर घर से निकल पड़े।
बारिश के साथ हिलमिल के खिल गए।
कहा बसेरा परिंदों का या प्राणियो का।
जहाँ जगह मिली वहाँ चैन से ठहर गए।
जंजावत आये या मेघतांडव हो भले।
पत्ते, डाली और वृक्ष वहीपें जड़ गए।
रात हो या दिन, चांद हो या सूरज।
बादलो, बिजलीने जगडना नही छोड़ा।
बिजली से चमकी धरा गगड़ाहट से ध्रुजी।
खिल उठी प्रकृति और हर पहलु मुस्कुरा गए।
