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Kalpana Misra

Tragedy

5.0  

Kalpana Misra

Tragedy

बाढ़

बाढ़

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428



गिर रहे पहाड़ों से पत्थर

हो गए घरौंदे जमींदौज

सड़कें दलाने छज्जे सब

बने हुये पानी का हौज


वो घर गिरा ज़मीन पे

ये बस जा गिरी है पानी में

इधर कोई पुल टूटा

उधर ज़िंदगी पानी में

पर्वतों से मैदानों तक

मचा हुआ है हाहाकार


नदियों में ऐसा उठा ज्वार

सर्वत्र मची है चीख-पुकार

भूखे-प्यासे बेबस सब जन

शिविरों में रहने को मजबूर

ये कैसी आपद- विपदा है

हो गये सबके घर चूर- चूर


जो पानी जीवन देता है

किए उसी ने सब स्वप्न भग्न

अब बची नहीं कोई जगह शेष

स्वयं देवता भी है जलमग्न


   


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