अर्धांगिनी का मौन
अर्धांगिनी का मौन
मुझे ऐसे पुरुष समाज से गहरी विरक्ति है,
जो स्त्री को अर्धांगिनी का सम्मान तो देते हैं,
पर उसके हृदय की पीड़ा को कभी अपना नहीं मानते।
वे उसके माथे का सिंदूर तो स्वीकार करते हैं,
किन्तु उसकी आँखों के आँसुओं का भार नहीं उठाते।
जब जीवन की कठिन राहों पर
उसे सबसे अधिक अपने साथी के विश्वास,
स्नेह और सहारे की आवश्यकता होती है,
उसी क्षण उनका अहंकार प्रेम से बड़ा हो जाता है।
वे हाथ थामने के स्थान पर
उसे अकेला छोड़ देना अधिक सरल समझते हैं।
कैसा है यह संबंध,
जिसमें अधिकार तो है,
पर अपनापन कहीं खो जाता है।
जिस नारी ने अपना सर्वस्व समर्पित कर दिया,
उसी के मौन को सबसे कम सुना गया।
उसकी मुस्कान के पीछे छिपे घाव,
उसके धैर्य के भीतर पलते तूफ़ान,
किसी ने जानने का प्रयास ही नहीं किया।
सच्चा पुरुष वही है,
जो अपनी अर्धांगिनी के आँसुओं को
अपनी आँखों की नमी समझे।
जो उसके संघर्षों में उसकी ढाल बने,
उसके मौन की भाषा को भी पढ़ सके,
और हर परिस्थिति में उसका हाथ थामे रखे।
क्योंकि प्रेम केवल साथ चलने का नाम नहीं,
बल्कि हर पीड़ा को आधा-आधा बाँट लेने का संकल्प है।
जिस दिन यह सत्य हर हृदय में उतर जाएगा,
उसी दिन अर्धांगिनी शब्द
अपने वास्तविक अर्थ को प्राप्त कर लेगा।
विरक्ति - नफ़रत
