“जहाँ दिल ठहर गया”
“जहाँ दिल ठहर गया”
मीरा की आँखों में उतरती उदासी, अयान दूर से पहचान लेता ,
वो कुछ कहती नहीं , फिर भी उसके दिल का हाल जान लेता ।
महफ़िल में मीरा हँसती रहती, मानो कोई ग़म ही नहीं,
अयान उसकी उस हँसी में छिपी ख़ामोशी सुन लेता ।
वो हर बार सवाल करके उसके दर्द को कुरेदता नहीं ,
बस चुपचाप उसके पास बैठकर, उसका हाथ थाम लेता ।
मीरा को जो पसंद न हो, अयान वो कभी नहीं करता ,
उसकी छोटी-सी ना को भी, अपनी चाहत से बड़ा समझता ।
कभी उसकी पसंद की कोई छोटी-सी चीज़ याद कर लाता,
कभी बिन वजह उसे शहर की गलियों में घुमा लाता।
अपने रिश्ते की बातें वो हर किसी से नहीं करता ,
अपनी मोहब्बत का लोगों के बीच तमाशा नहीं बनाता ।
मीरा के हिस्से का ग़म, वो अपने हिस्से रख लेता,
और उसकी एक मुस्कान के बदले ,अपनी सौ खुशियाँ वार देता।
उसे मीरा को बदलना नहीं , बस समझना था,
उसकी ख़ामोशी में छिपे हर एहसास को पढ़ना था।
न जिस्म की ख्वाहिश, न मोहब्बत का दिखावा,
बस मीरा की रूह को सुकून मिले, यही था अयान का वादा।
मीरा को हैरत थी, वो बिना कहे सब जान लेता था,
उसकी आँखों में छिपे हर दर्द को, मुस्कुराकर पहचान लेता था।
शायद यही सच्चा प्रेम था—जो शब्दों का मोहताज़ न था,
वो कुछ कहती नहीं, और अयान फिर भी सब समझ जाता
और इसीलिए मीरा प्रेम से कहीं ज़यादा , अयान को पूजती थी।
