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Hoshiar Singh Yadav Writer

Abstract


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Hoshiar Singh Yadav Writer

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अपने सपनों के लिए

अपने सपनों के लिए

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अपने सपनों के लिए,

ख्वाब बिछाये जाते हैं,

पर कमबख्त सपने भी,

कभी आते यूं जाते हैं।


अपने सपनों के लिए,

दुख दर्द का विष पिये,

कभी दिल ललचाते हैं,

बाँहों में नहीं आते हैं।


अपने सपनों के लिए,

कौन जन ना सोता है,

हसीन सपने न आये,

सुबक सुबक रोता है।


अपने सपनों के लिए,

विश्वास वो जमाता है,

सपने जब भूल जाता,

कुछ हाथ न आता है।


अपने सपनों के लिए,

लंबे समय जन जीये,

सपने साथ ना देते है,

लगे पिये बिना पिये।


अपने सपनों के लिए,

उठकर सुनाता कहानी,

कुछ याद रहे नहीं रहे,

अदा होती है मस्तानी।


अपने सपनों के लिए,

इंसान कभी लड़ता है,

बुरे सपने जब देखता,

दिनभर जन डरता है।


अपने सपनों के लिए,

बहुत सोच बनता है,

पर सपनों के बल पे,

कुछ नहीं वो पाता है।


अपने सपनों के लिए,

करता है जन इंतजार,

सपने कभी दिल भरे,

सुंदर सुहाना सा प्यार।


अपने सपनों के लिए,

इंसान जागता रहता है,

सपने सुहावने होते हैं,

पागल इंसान कहता है।


अपने सपनों के लिए,

खुद ही राह बनाता है,

उसके मन मंदिर में तो,

सपना चला आता है।


सपनों पर एतबार करे,

उचित नहीं कहाता है,

सपने तो कई बार ही,

मन को ही बहलाता है।


सपनों की अजब बात,

कर देते दिन की रात,

फिल्म सा सपना चले,

कहते सपनों की बारात।


अपने सपनों के लिए,

आओ अब सो जाएंगे,

सुबह उठकर देख लो,

ये यादों में बस जाएंगे।


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