अपने ही तन में कैद हूँ
अपने ही तन में कैद हूँ
घुटी घुटी सी ज़िन्दगी
मन कुछ और है
और तन कैदी सा है....
देह कुछ और है
रूह कुछ और
दरमियाँ मेरे
एक हलचल चला करती है।
किस से कहूँ कैसे कहूँ
अपने ही तन में कैद हो गया हूँ।
विचलित मन,अंजानी सोच,
चला करती है...
नया नया सा एहसास ये हुआ है अभी
मर्द हूँ मगर मर्द सा ना हूँ मैं।
मेरी चाल अलग, मेरे जज़्बात अलग
अपने ही तन में कैद हो गया हूँ मैं....
स्कूल में शिक्षक खिलखिलायें
बच्चे भी बहुत मज़ाक उड़ाएं
ना डर ना खौफ इनका
खुले आसमान में जीना चाहता हूँ मैं भी।
सजना-सँवरना चाहता हूँ मैं
नारी सा बनना चाहता हूँ मैं भी
माँ संग, बाप संग हँसना
चाहता हूँ मैं।
प्यार पाना चाहता हूँ मैं भी
अलग हूँ तो क्या हुआ,
हूँ तो उन्हीं की डाली का फूल।
उनके सीने से लग
रोना चाहता हूँ मैं भी।
महकना चाहता हूँ मैं भी,
उनके स्नेह में खोना चाहता हूँ मैं भी।
ना शर्म करता हूँ,
ना खौफ है मुझे,
आज सबके समक्ष ये कुबूल
करना चाहता हूँ. .
बेटे के लिबास में छिपी बिटिया हूँ,
अपनी माँ के दुलार की
प्यासी बिटिया हूँ मैं।
मैं अलग हूँ तो क्या दोस्तों
अपने ही तन में कैद हूँ तो क्या
हूँ तो मैं भी एक इंसान।
