अपेक्षा और उपेक्षा
अपेक्षा और उपेक्षा
अपेक्षा और उपेक्षा ,
दोनों साथ चलती है।
पल -पल जीवन में,
कितनी करवटें बदलती है।
उपेक्षा करते हैं
प्रेम की
आंखें बिछायें रहते हैं।
दिल गहराई तक,
जिसे चाहता है।
उससे उपेक्षा ही पाते हैं।
अपेक्षा करते हैं
शांति की
मन को,
शांत -चित्त बनाते हैं।
कितनी ,
उथल- पुथल है विचारों में।
लेकिन
उससे उपेक्षा ही पाते है।
उपेक्षा करते हैं
सहयोग की
एक साथ,
एक हाथ,
एक अहसास
चाहते हैं।
भीड़ के संमदर का,
हिस्सा हो कर,
तन्हा रह जाते हैं।
सहयोग की,
अपेक्षा करते हैं
और उपेक्षा ही पाते हैं।
साथ रह कर,
चाहे दोनों ,
अलग- अलग चलती है।
उम्मीद की,
एक नन्ही सी लौ
दोनों के हृदय में जलती है।
