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Nisha Nandini Bhartiya

Tragedy


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Nisha Nandini Bhartiya

Tragedy


अनुचरी बन घूमती है

अनुचरी बन घूमती है

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अनुचरी बन घूमती है 

घर लौटी मजदूरन 

प्यार से वंचित व्यथित 

केवल देह मात्र होकर

जुट जाती है घरेलू कामकाज में, 


बच्चे की नाक पोंछती हुई 

चूल्हा जलाती है, 

बच्चों को बगल में बिठाकर 

आटा मलकर रोटी पकाती है। 


वह लौटती है डरी,

सहमी हुई सी

भूलकर वास्तविक रूप को 

पत्नी, माँ, बहन, बेटी होकर

रात की नींद में भी 

वह सुबह के स्वप्न देखती है, 

आंगन का बुहारना। 


चूल्हे में पड़ी बुझी राख ,

चक्की पर अनाज का दलना, 

भूल जाती है अपनी

पिंडलियों की असहनीय पीड़ा। 


घर की धूरी घूमती है

उसके चारों ओर,

नन्ही सी बिटिया माँ से लिपटी 

नींद में मुस्कुरा रही है, 


पेट में लिए अजन्मे को

संभाले हुए, ईंट - गारा ढोती है। 

नहीं बन पाती कभी सहचरी

सदैव अनुचरी बन घूमती है। 


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