अंत एक जैसा क्यों है
अंत एक जैसा क्यों है
कभी-कभी मैं घंटों सोचती हूं,
क्या सच में सब कुछ वहम था?
क्या सच में सिर्फ मैं ही गलत थी?
क्या सच में सब कुछ मन का खेल था?
जाने कितने सारे सवालों में उलझी हुई,
खुद ही जवाब ढूंढते रहती हूं।
वैसे अब तुमसे जवाब की उम्मीद हैं ही नहीं
और तुम जवाब देने वाले होते ही कौन हो?
जिस इंसान ने सवालों का सामना ना किया हो,
उसमें जवाब देने की हिम्मत कहां से ही आएगी।
पर बाद में सोचती हूं कि
किसी दूसरों को क्या ही दोष दूं
जब सवालों का बीज मैं बोती हूं,
तो जवाब की गहराई भी मुझे ढूंढनी पड़ेगी।
अक्सर बात करते वक्त समझ आता है
कि तुम्हारे अंदर सब कुछ झूठ है
सच का सामना करने की भी हिम्मत नहीं है
बाद में फिर बहुत सोचती हूं
क्या सिर्फ मैं थी जो शुरू से अंत तक झूठी रह गई?
पर समझ नहीं आता कि सिर्फ मैं ही झूठी कैसे रह गई..
ऐसा लगता नहीं था कि सिर्फ मैं ही गलत हो सकती हूं,
पर अब लगता है कि हां, शायद हो सकता है।
क्योंकि पहल तो मैंने ही की थी,
और अब समझ आता है कि बुनियाद ही गलत थी
पर यह सवाल भी आता है कि,
एक ही कहानी का दो बार एक जैसा अंत कैसे हो सकता है?
अगर एक बार हुई घटना दोबारा घटे,
तो उसमें तजुर्बा इस्तेमाल किया जाना चाहिए।
जरा सोचो,
दो कहानी की शुरुआत एक जैसी हो
और अंत भी एक ही जैसा हो!
पर अंत जैसा एक क्यों है?
थोड़ा अच्छा होना चाहिए था ना
या
शायद पहले से बेहतर होना चाहिए था।
पर अब
धीरे-धीरे सब कुछ समझने लगा है
समझ आता है कि
कहानी की शुरुआत और अंत दोनों एक जैसे हो सकते हैं।
फिर भी सवाल यही है कि
क्या अंत एक जैसा होना चाहिए था?
पर जवाब तो यही मिलता है कि अंत एक जैसा ही है।
