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Meena Mallavarapu

Abstract Inspirational

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Meena Mallavarapu

Abstract Inspirational

अंधेरे उजाले

अंधेरे उजाले

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अंधेरे में क्यों दुनिया अलग सी है दिखती 

क्यों हर डर हो जाता है आवर्धित 

क्यों ख़यालों की दुनिया में

मच जाती अनायास खलबली-

 क्यों अंधेरे में

 

चिंता और अवसाद की कड़ी

हिला देती हौसलों की बुनियादें

क्यों हो जाता धैर्य अंधेरे को समर्पित-

आंख खोलते ही इस दुनिया में

जो उजाले को देख कसमसाया


जो उजाले से डर कर चीखा चिल्लाया- 

क्यों आज अंधेरों से निभा रहा दुश्मनी

पूर्वाग्रह हैं शायद,या सज़ा की धमकी

जो घर कर बैठी मन मस्तिष्क में


अंधेरों का डर हरा देता कभी कभी 

राहें रूठ जातीं मंज़िलें ग़ुम हो जातीं 

 हैं हम अंधेरों का हिस्सा फिर भी

आदी न हो पाते क्यों हम अंधेरों के

कृतघ्न फ़ितरत हमारी,क्यों समझ न पाते


अंधेरों उजालों के संतुलन ने किया उद्धार हमारा

किसी एक की कमी कर देती जीवन दुश्वार

दोनों ही जीवन के सिक्के के दो पहलू 

एक बिना दूजा अधूरा


अंधेरे उजाले दोनों स्थितप्रज्ञ,राग द्वेष से दूर

भय और चिंता, मनोमालिन्य और ग्लानि 

है हमारी देन ख़ुद को, 

अंधेरों उजालों का इनसे क्या लेना देना।


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