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V. Aaradhyaa

Romance Inspirational

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V. Aaradhyaa

Romance Inspirational

अलसाई रमणी बौराई

अलसाई रमणी बौराई

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अब बीत गयी अब शरद,शीत की रातें ,

ऋतु बसंत कैसी मधुरिमा मधु भर लायी !


तत्पर चखने को कुछ ऐसे जाग्रत हो गई ,

मानो सम्पूर्ण धरा व गगन की तरुणायी !


मादक सी मंद मंद पवन सुवन बह रही ,

मलंग और मदहोश कर रही है पुरवाई !


पुलक भर रही रही है ऐसे तन मन में ,

जगाकर अनुपम व अलौकिक अंगड़ाई !


वन उपवन सब कैसे चहक महक रहे हैं,

देखो कैसे खिल रही घर आंगन फुलवारी !


मधुकर मधुरस पीकर गुंजन कर रहे हैं ,

और चहूँ ओर हॅ॑स विहॅ॑स रही है विभावरी !


खग अब कुल कलरव किलोल कर रहा है ,

किसलय कैसे डोल रहा पीने मधुरस गागरी !


आए ऋतुराज हमारे समक्ष प्रकट हुए ऐसे ,

मानो प्रकृति हमें सुना रही हो भावरस दादरी !


बसंत ने ऐसा वश में किया ह्रदय का स्पन्दन ,

कि, बाहुपाश में बिंधने को विकल हुई कुँवारी !


दहक रहा पलाश, सुमन उपवन से सुगंधित ,

अलसाई सी रमणी अपने पियमिलन को बौराई !


©®V. Aaradhyaa 




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