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Divya Patel

Drama Tragedy


2.0  

Divya Patel

Drama Tragedy


अकेलापन

अकेलापन

1 min 461 1 min 461

नोचता हैं खसोटता हैं ये अकेलापन

साये की तरह पीछे लगा रहता है

दिन के उजाले में उदासी सा और,

रात के अँधेरे में खौफ की तरह।


दिन ढलता है रात आती है ये,

अकेलापन मुझे बहुत रुलाता है

रात का सन्नाटा है,

सब सोए हैं अपने अपने घरों में।


मैं फिर निकल पड़ी,

इस अकेलेपन के सफर में

साथ है कुछ कड़वी यादें, कुछ कटु अनुभव,

नोचता हैं खसोटता हैं ये अकेलापन।


अब घुटता हैं दम मेरा,

बोझिल है मेरी आँखें,

पाँव लड़खड़ा गए हैं,

टूट रही हैं साँसें।


दिल में यही सवाल है...

आखिर कब खत्म होगा

ये अकेलापन का सफर

नोचता है खसोटता है ये अकेलापन....।।


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