अजीब हूँ ना मैं..!
अजीब हूँ ना मैं..!
कहते हैं वक़्त सबकुछ सीखा देता है
, सच है या झूठ...!
नहीं पता,
पर..
चले जा रहे हैं,
चले जा रहे हैं,
कभी तन्हाई में सुबक लेते हैं..,
तो कभी. .
उसके दिये जख़्म को कुरेद कर
ख़ुद ही हरा भरा कर देते हैं ,
आगे बढ़ने के वास्ते
हौसला मिलता है,
अजीब हूँ ना मैं..!
कोई हाथ नहीं थामता,
तो भी...
किसी को गिराती नहीं हूँ,
ख़ुद आगे बढ़ने के लिए..!!
