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Surendra kumar singh

Abstract

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Surendra kumar singh

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ऐसा भी होता है क्या

ऐसा भी होता है क्या

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ऐसा भी होता है क्या

जैसा हो रहा है

जैसा कि मैं

महसूस कर रहा हूँ

सपने, हकीकत की

तरह मेरे आस पास

चहलकदमी कर रहे हैं

कभी मैं सपनों को

देखता हूँ

कभी सपने मुझे देखते हैं

मैं विस्मय से

भरा जा रहा हूँ

सपने थे

और बिना किसी प्रयास

हकीकत में बदल कर

मेरे आस पास

चहलकदमी कर रहे हैं

शायद यही प्रेम है

महसूस भर होता है

पर कर जाता है वो सब

जो मुश्किल होता है

बहुत मुश्किल होता है।


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