अद्भुत प्रेम
अद्भुत प्रेम
जाने कहाँ खो गयी हूँ,
मैं क्या से क्या हो गयी हूँ,
मौन हैं आज वाणी भी,
मौन हैं हर भाव भी,
खुद से खुद के मिलन का,
जगा जैसे आभास भी,
अब क्या मुझको हैं पाना,
शायद पूर्णविराम है
आज मैं खुद में नहीं हूँ,
बस तेरा ही नाम है
प्रेम का एक खज़ाना,
ही बस मेरे पास है,
एक तेरा ही नाम है
और न कोई आस हैं
ओढ़ इस प्रेम को ही,
बस प्रेम में ही रंगी हूँ मैं,
रंग दू बस अब सारी वसुधा,
प्रेम के ही रंग में मैं,
राग द्वेष सब भूल कर,
बस प्रेममय ही हो सब बस,
प्रेममयी इस वसुधा में फिर,
न कुछ तेरा मेरा होगा,
बस प्रेम से भरा पूरा,
विश्व एक परिवार होगा,
विश्व एक परिवार होगा।।

