अब न ऐसी प्रीति लिखूंगा
अब न ऐसी प्रीति लिखूंगा
नहीं लिखूंगा गीत प्रेम के
न ही तुमको मीत लिखूंगा
विरह वेदना से पीड़ित मैं
अब न मैं मनमीत लिखूंगा।
तुम ही हो मेरी यादों में
तुम ही हो मेरी बातों में
लगता है न दिल तेरे बिन
अब न ऐसी प्रीति लिखूंगा।
तेरी वो पायल की छमछम
जो मन को झंकृत करती थी
मेरा मन उनसे भी रूठा
अब न मैं झनकार लिखूंगा।
तेरी चाहत में आँखें जब
बारिश बन भीगा करती थीं
ऐसी यादों के सावन की
अब न मैं बरसात लिखूंगा।
तेरी आहट से अधरों पर
मुस्कानें विखरा करती थीं
ये भी अब हैं तुमसे रूठी
अब न मैं मुस्कान लिखूंगा।
उलझ गए जज़्बात भी मेरे
हालातों के मंजर से
अब न है कोई अभिलाषा
न ही अब जज़्बात लिखूंगा।

