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Surendra kumar singh

Abstract

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Surendra kumar singh

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आवरण

आवरण

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सक्रिय होने का समय है

और जरूरत भी

पर हम बहस में मशगूल हैं

आवरण हटायें

और मूल तक जाएं

यकीनन पहचान का गहरा संकट है

आवरण ही मूल हो गया है

और मूल लगभग अदृश्य

और अब अगर बहस स्थगित कर

आवरण हटायें,

आवरण चाहे राजनीति का हो,

चाहे धर्म का हो

तो मिलेगी मनुष्य के

कल्याण की प्यास

और एक अदद मनुष्य भी।

अगर हम ऐसा कर सके

तो ये एक अनुभूति हो सकती है

की जिसे हमने हटाया

वो राजनीति नहीं थी

वो धर्म नहीं था

जिसमें डूबकर हम

बहस में तल्लीन थे

आरोप प्रत्यारोप ही नहीं

युद्ध भी कर रहे थे,

आमने सामने भी

और छिप छिप कर भी।


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