"आवाज़ उठाये कौन भला "
"आवाज़ उठाये कौन भला "
झूठ और अन्याय के प्रति यहाँ आवाज कौन उठाता है।
यहाँ इंसानों के रूप में जिंदा लाशों का ढ़ेर घरों में रहता हैं।।
हत्या, अत्याचार, बलात्कार नित नये अपराध रोज़ यहाँ होते हैं।
आंखों पर पट्टी रखकर हम सब, आत्मा को मुर्दा करके सोते हैं।।
ना पहुंचे क्षति हमें कोई ना आँच हमारे अपनों पर आए।
इसलिए हम अपने अंदर की, आवाज़ को जिंदा दफ़ना कर रखते हैं।।
घर घर बैठे हैं अपराधी, धारण कर रूप विधाता का।
हम जान कर भी अनजान, अपनी आंखों को मुँदे रहते हैं।।
व्यक्तित्व हमारे पर देखो ये कैसी मालीनता छा गई यहां पे।
डर और भय के कारण हम, आवाज़ ना सत्य की उठा पाते हैं।।
