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V. Aaradhyaa

Romance Classics Inspirational

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V. Aaradhyaa

Romance Classics Inspirational

द्विराग़मन से पहले नहीं

द्विराग़मन से पहले नहीं

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" अरे यह क्या कर रहे हो पाहुना !

अभी तुम दुल्हन का चेहरा नहीं देख सकते !"

 दुल्हन बनी प्रिया का नया दूल्हा ज़ब अपनी दुल्हन के पास आया तो...

उसे घूँघट उठाने से रोकते हुए तब घर की बूढ़ी दादी बोल उठी,

"ना... ना... अभी दुल्हन का मुंह नहीं देख सकते। अभी नई नई शादी हुई है बिना दुरागमन के नई दुल्हन का चेहरा नहीं देख सकते। द्विराग़मान के बाद ही दुल्हन का मुँह देख सकते हैं !"

सुनकर दूल्हे राजा मनोज का मुँह छोटा सा हो गया।

 उसका कितना मन था दुल्हन को देखने का मन मसोसकर रह गया। और बड़ों की बात कैसे टाल सकता था। इसके अलावा 

परंपरा थी तो उसे मानना ही पड़ा।

किसी तरह वह अपनी दुल्हन को देखने की इच्छा मन में दबाए बारात के साथ ही वापस आ गया।

तब कम उम्र में ही शादी हो जाती थी और फिर

एक या तीन साल बाद लड़कियों की विदाई होती थी।

 इस बीच बिना देखे ही दोनों के बीच चिट्ठीयों का आदान-प्रदान शुरू हो गया । वह भी बहुत मुश्किल से पढ़ने को मिलती थी। जब कोई बिचौलिया ला कर देता था।

 खैर... मिलने की बेचैनी को मन में दबाए ज़ब दोनों युक्त व्यस्क के हुए तब जाकर हुआ प्रीति का द्विराग़मन।

 और....तीन साल के बाद जब उसकी पत्नी उसकी दुल्हन बनकर उसके घर आई,

तभी वह घूंघट उठाकर वह अपनी पत्नी का चंद्रमुखी देख पाया था।

 दोनों एक दूसरे को देख कर भाव विभोर हो गए।

 और किस तरह शुरू हुई उनकी प्यार भरी गृहस्थी की शुरुआत।

आज भी अपनी पत्नी की मुंहदिखाई ना तो मनोज भूल पाया है और

 ना ही उसकी पत्नी प्रिया।दोनों के लिए वह

प्रथम मिलन यादगार बनकर रह गया है।

 कभी यूं भी होता था प्यार।

जब एक दूसरे से मिलने के लिए कई जतन करने पड़ते थे।


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