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जुआरी
जुआरी
★★★★★

© Minni Mishra

Drama

4 Minutes   376    10


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गाड़ी को आगे जाने का परमीशन नहीं है, यहीं उतरना पड़ेगा | चलो, कुछ देर पैदल का भी मजा लेते हैं |

गाड़ी को पार्किंग में लगाकर, हम दोनों एक-दूसरे का हाथ थामें...भीड़ के साथ-साथ चलते रहे | मैं बेहद खुश थी... मानो, जन्नत सिमटकर आँचल में समा गई हो | ‘औरत जिसे प्यार करती हैं...उसके प्रति तन-मन से समर्पित हो जाती है | इनके हाथ में अपना हाथ देखकर... अपने को पूर्ण सुरक्षित महसूस करती रही |

भीड़ में चलते-चलते जैसे ही इनकी नजर ऑफिस के मित्रों पर पड़ी , हाथ छूट गया | ये मित्रों के साथ तेजी से आगे बढ़ते गये और मैं इनके पीछे | मर्दों की चाल तेज होती है...सुनती थी...अब समझ में आने लगी |

उनलोगों से गप्प में ये इतने मशगूल हो गये कि एकबार भी पीछे पलट कर नहीं देखा ! भीड़ में ये ओझल होते गये और मैं, उचक-उचक कर इनको देखती रही | सड़क के दो बगली... क्रिसमस के अवसर पर सजी-धजी, दुल्हन-सी दुकानें...बड़े-बड़े-पोस्टर और लुभावने विज्ञापनों के बेनर आकर्षित कर रहे थे |

भीड़ बेकाबू हो जाने के कारण, मैं, चिल्लाई... “सुनिए...जी...” | पर, कान फाड़ती माइक की आवाज...में मेरी आवाज दब कर रह गई !

इनकी कही बातें “ देखो, यह बड़ा शहर है... हम बड़े लोगो की तरह घुमने जा रहे हैं | देहाती की तरह तुम वहाँ लोगों के बीच शर्माना नहीं...इसी तरह हाथ में हाथ डाले रहना | यह हमारा पहला क्रिसमस है, जमकर मस्ती करेंगे |’ दिल को कचोटने लगी |

मैं आगे बढती गई | सामने बड़ा सा भव्य हाल दिखा...बाहर लिखा था ‘हैप्पी क्रिसमस’ | जान में जान आयी... जगह पर पहुँच गई | हाल के एक कोने में ,आकर्षक चह्चहाता बियर-बार | अंदर में पुरुष और, लगभग उसी अनुपात में महिलायें भी | रंगीन प्याला हाथ में लिए ...डिस्कोथेक पर सभी सान्ताक्लौज के वेश में झूमते-गाते | पहली बार देखने का मौका मिला ,देखकर हैरान रह गई | वाह रे नारी-पुरुष के बराबरी की भागीदारी ! हम कितने अत्याधुनिक हो गये हैं! सान्ताक्लौज को भी बियर-बार तक ले आये ! यहाँ तो मनोरंजन के नाम पर धर्म का सरेआम मजाक उड़ाया जा रहा है |

उसी झुण्ड में ये दिखे | मेरे पैरों तले जमीन खिसक गई | ऑफिस से घर लेट आने के... इनके हजार बहाने, अब संदेह के घेरों में दिखने लगा था |

आधुनिकता के इस चकाचौंध को देखकर मेरा देहाती हाव-भाव..एकबार भय और आशंका से कुम्हलाने लगा ! पर्स से मोबाइल निकाल, लगातार रिंग करने लगी |

कंधे पर हाथ का नर्म स्पर्श .. मैं, पलट कर देखी | इनको खड़ा देख, गुस्से से तिलमिला उठी |

“ दोस्तों के साथ कुछ बहक-सा गया था... घर चलो |” मेरे हाथों को अपने मुठ्ठी में भींचते हुए...उन्होनें आहिस्ता से बोला |

“ खबरदार, जो मुझे हाथ लगाया ,अब आपकी बातों पर भरोसा ही नहीं रहा |”

“ शहर की चकाचौंध देखकर तुम्हारी जवान भी कैंची की तरह चलने लगी है | अपना पीता हूँ...तेरे बाप का नहीं | मायके में देखा ही क्या... | ईश्वर का शुक्र मना जो मुझसे शादी हुई | वरना सुख-सुविधा किस चिड़िया का नाम है...वो जानती भी नहीं ! सड़ती रहती कस्बे के छोटे से खपरैल के मकान में | माँ-बाप ने दिया ही क्या ? ’गरीब घर की लड़की बहुत संस्कारी होती है’ सब वकवास है | “

“ हाँ... माँ-बाप ने तो मात्र खुद्दारी का एक संस्कार दिया | जो आपके अमीरी के संस्कार से कई गुना भारी दिख रहा है | झूठ बोलकर पत्नी का दिल नहीं जीता जाता | दिल जीतने के लिए समर्पण चाहिए...अमीर होना जरूरी नहीं | तुम पैसे से केवल शरीर पर राज कर सकते हो ...दिल पर नहीं ! ऐसे अमीर पति के साथ मैं नहीं रह सकती | “मैंने एक ही सांस में सबकुछ कह डाला |

गाय सी सीधी दिखने वाली पत्नी इस तरह से पति को जलील करेगी, शायद पास खड़ी भीड़ को भी अंदाज नहीं था | हारे जुआरी की तरह पति की नजरें झुक गई |

भीड़ छटने लगी... सत्य चट्टान की तरह खड़ा मुस्कुराता रहा |

असर शहर सत्य चकाचौंध

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