संस्मरण..

संस्मरण..

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संस्मरण... यानी पुराने यादों की याद...यह याद की यात्रा भी बड़ी विचित्र गति है.... दर्द याद करो तो टीस उठती है....खुशी याद करो तो मुस्कान बनती है...कुछ पल गुदगुदाते हैं तो कुछ आंखों को नीर क्षीर कर देते हैं।

पर सबसे विचित्र गति यही है कि हर गुजरा पल संस्मरण ही होता है। बात सन 2006 की है, जब बड़े चाव से हमने वैष्णो देवी के दर्शन करने की योजना बनाएँ। हम ठहरे मैदानी इलाकों के लोग, पहाड़ों से अनभिज्ञ, शायद ऐसा कहना उचित नहीं होगा, क्योंकि अमरकंटक के दर्शन हमने किया है पर जबसे हिमालय के पहाड़ों के दर्शन कर लिए है तो कहने में गुरेज नहीं कि वह पहाड़ों का मैदानी क्षेत्र है। जनवरी महीने की यात्रा थी, यह अंदाजा तो था कि ठंड बहुत होगी पर कितनी ? यह नहीं मालूम था। बहुत ऊनी कपड़े हमने पैक कर लिए।

सारा प्रोग्राम हमारा सैट था। पहले हमें दिल्ली पहुंचना था, फिर वहाँ से जम्मू तवी एक्सप्रेस से जम्मू स्टेशन, फिर कटरा। कटरा से हमें पहाड़ चढ़ना था। यह सारी यात्रा निर्विध्न पूरी कर सुबह सवेरे हम जम्मू पहुंचे।

वहाँ से बस पकड़कर कटरा पहुंचे। कटरा में एक होटल में कमरा बुक किया, हम चार लोग थे इस सफर में, मैं... मेरे पतिदेव, मेरी बेटी पिंकी और मेरे पति के दोस्त का बेटा राजीव। जिसे हमने इस लिए साथ ले लिया था कि ऐन उसी वक्त बेटे की परीक्षा डिक्लेयर हो गई थी, उसने टिकट कैंसिल कराने के लिए कहा तो इनके दोस्त ने कहा कि मेरे बेटे की बहुत इच्छा है, साथ लिये जाओ, यह घूम भी लेगा और समान इधर-उधर चढ़ाने में तुम्हारी मदद भी कर देगा। अतः बेटे की टिकट पर हमारे साथ राजीव था।

यह वह समय था जब मैं डाक्टरी भाषा में सीवियर एनीमिया की घोषित पेशेंट थी। दस साल का वह पीरियड

जब मेरा हीमोग्लोबिन पांच प्रतिशत पर स्थित था, न घटकर चार होता था, न बढ़कर छः।

जाने क्या इलाज करते थे कि मुझ पर सारी दवाई फेल हो जाती थी। मैं सूख कर कांटा जैसे हो गई थी। पति इस सफर के लिए तैयार नहीं थे पर साम, दाम, दंड, भेद की सारी आजमाईश कर मैंने राजी करवा ही लिया था। मन में एक संकल्प ठान लिया था कि शायद मरना ही लिखा हो, उसके पहले दर्शन तो कर ही ...आऊँ।

हमने कटरा में दो कमरे लिए, एक अपने लिए, एक राजीव के लिए। जल्दी-जल्दी नहा धोकर तैयार होना था,

चढ़ाई के लिए। बाथरूम में पानी इतना ठंडा कि छुआ भी नहीं जा रहा था। गीजर क्यों नहीं था , पूछने पर पता चला कि पचास रूपये में एक बाल्टी गरम पानी की व्यवस्था है।

मरता क्या न करता के अंदाज़ में लिये तीन बाल्टी गरम पानी। किसी तरह नहा धोकर, तैयार ह़ोकर

निकले होटल से, नज़दीक ही साइन बोर्ड का कार्यालय था, वहाँ से टिकट बनवाया और चल पड़े श्रद्धा से भरे हुए मां वैष्णो देवी के दर्शन के लिए....। तब तक शाम के चार बज चुके थे। पहली यात्रा... पहला अनुभव... जो लोगों को करते देखते, वही करते.... पता चला कि आटो एक आदमी का पांच रूपया भाड़ा पर दो किलोमीटर आगे छोड़ देती है, लिहाजा हमने भी आटो पकड़ा और दो किलोमीटर आगे गए।

यहाँ एक बात और बताना जरूरी समझती हूँ आपको कि ... मन में संकल्प लिया था कि नंगे पाँव चढ़ाई करना है ... तो पतिदेव की लाख घुड़कियों के बावजूद जूते-मोजे नहीं पहने। उनकी तरेरती आंखों के बावजूद पहना

तो एक सैंडल, वह भी इस मंशा के साथ... कि फूल-पत्ती की किसी दुकान पर उतार कर रख देंगे....जैसा अपने शहर में करते थे। पर तब तक ही पैर ठंडे होने लगे... हिम्मत टूट गई... बिना चप्पल के चढ़ने की।

अब कोई चारा ही नहीं था कि वापिस होटल जाकर जूते मोजे पहनकर आ सकते.... तो चढ़ना इसी सैंडल के भरोसे ही था। अभी भी मैं मन में पक्का इरादा ठाने बैठी थी कि चढ़ेंगे तो पैदल ही....दुकानों में छड़ियाँ बिक रहीं थीं, हम लोगों ने भी चार छडियाँ खरीदी.... और चढ़ाई चढ़ना प्रारंभ किया.... ये लो... थोड़ा आगे बढ़ते ही हिम्मत छूट गई मेरी....।

पतिदेव समझ चुके थे मेरी हिम्मत को... एक जोर की डांट लगाई, और रोक लिया एक खच्चर वाले को दाम तय किया... और बोले कि बैठो इस पर...जहां यह रोके....वहीं बैठकर हमारी प्रतिक्षा करना... हम भी वहीं

पहुँचेंगे। मैंने कहा कि सभी के लिए खच्चर कर लीजिए... फिर डाँट पड़ गई कि तुम चलो...हम आ रहे हैं..

क्या कहती... बढ़ना ही था.... उस समय यह व्यवस्था थी कि साढ़े छः किलोमीटर तक खच्चर जाता था... उसके आगे पैदल ही चढ़ना ही पड़ता था। अब मैं खच्चर पर....बाकी लोग पैदल.... सोच कर मेरी आंखों से आँसू गिर रहे थे.... चलते हुए लोग कहते कि जय माता दी.... मैं रोते रोते जवाब देती.. जय माता दी।

साढ़े छः किलोमीटर बाद खच्चर वाले ने मुझे उतार दिया, और मैं एक जगह बैठ कर सबकी प्रतीक्षा करने

लगी। मन चोर हुआ पड़ा था.... आँख में आँसू थे...तभी देखा कि पिंकी चली आ रही है खच्चर में...।

उसके पीछे मेरे पतिदेव....उनके पीछे राजीव... सभी खच्चर में। चलो... सब ठीक हुआ... अब तो पैदल ही चढ़ना एक मात्र उपाय था। सबसे कमजोर मैं थी... थोड़ा चलते ही थक जाती थी.... सब मेरी वजह से धीरे चलते थे.... तीन बार मैंने अपने पति को अपने साथ गिरा दिया था... सहारा देने की वजह से....।

पहाड़ों में किलोमीटर भी ज्यादा लंबे लगते हैं, हमेशा लगता है कि इतना चले फिर भी एक किलोमीटर नहीं हुआ। खैर... हम अर्धकुंवारी पहुंचे.... सभी उस छोटी सी गुफा को रेंगकर पार करते ही हैं.... हमने गुफा को प्रणाम किया... और एक बड़े से पीपल या बरगद के पेड़ के नीचे के चबूतरे पर बैठ गये। हमें गुफा में घुसते नहीं देखकर वहाँ ड्यूटी पर तैनात लेडी पुलिस ने पूछा मुझसे.... कि हम गुफा में क्यों नहीं जा रहे हैं.... मैंने कहा कि इतनी संकरे मुहाने से कोई कैसे पार कर सकता है... तब उसने एक गहरी नजर देखा मुझे और कहा कि यहाँ से मोटे से मोटे लोग पार हो जाते हैं.... आप तो बहुत ही दुबली पतली हैं.... जाइए...

गुफा को पार कीजिए.... वरना....दर्शन अधूरा ही रह जाएगा। जब ललकारा तो फिर पीछे क्या देखना... हाथ जोड़े मां वैष्णो देवी को... और प्रवेश कर लिया...थोड़ा आगे बढ़ते ही घबराहट तारी हो गई मुझ पर.... न आगे सरका जा रहा था.... न पीछे ही.... मैंने ज़ोर से आवाज़ लगाई कि ....कोई है.... मुझसे आगे नहीं बढ़ा जा रहा है...क्या करूँ...पीछे से मेरे पति की आवाज़ आई...मैं हूँ.... आगे सरको....एक चैन लटका हुआ है... पकड़ो

उसे... मन में एक विश्वास जगा... किसी तरह सरक कर आगे बढ़ी...आगे चेन को पकड़ा... तब तक पतिदेव ने हाथ पकड़ा... और खींच लिया ऊपर। फिर करीब बारह बजे तक किसी तरह चढ़ाई पूरी हुई... सामने ही मां वैष्णो देवी का मंदिर ... लगा कि एक यग्य पूरा हुआ... .जूते चप्पल उतारे... सामने एकदम गीला कारपेट... लग रहा था कि पैरों में सुईंयाँ चुभ रही है...गनीमत थी कि दर्शनार्थियों की लाईन छोटी थी... अंदर मां की आरती का समय था... हम आरती में शामिल हुए... करीब दस मिनट तक दर्शन लाभ मिला... वाकई हम बड़ भागी थे.... सारी श्रद्धा सार्थक हो गई।

बाहर निकल कर जब जब वापिस चप्पल जूते पहने तब जान में जान आई। बहुत थक गये थे हम.... भैंरों बाबा और तीन किलोमीटर ऊपर विराजमान थे.... हमने हिम्मत छोड़ दिया... लगा कि नहीं ही चढ़ पायेंगे....सभी जगह लिखा हुआ था कि बिना भैरों दर्शन के मां वैष्णो देवी दर्शन अधूरा है.... पर शरीर में उर्जा कहाँ थी...मन विचलित था.... सोचा कि नहीं जाते.... पर पिंकी और राजीव बोले कि आप लोग बैठो....हम आते हैं दर्शन करके.... लोगों का रेला तो लगातार चल ही रहा था.. बटोरे हमने भी हिम्मत.. और ठान लिया कि दर्शन को आएँ हैं तो.... पूरा करना ही है।

फिर भैरों बाबा के दर्शन भी किया.... भेंट भी चढ़ाया। फिर नीचे उतरते भी मुझे तो नानी याद आ गई.... बच्चों में तो उर्जा थी ही... पतिदेव मेरी चाल चल रहे थे... संभाल रहे थे... और मैं सब भूल कर अपने ईष्ट की शरण में थी.... हे शिव जी मदद करो.... और दो शिव के सहारे उतर भी गई...मेरे पति का नाम भी सोमनाथ ही है।

छः बजे हम होटल के अपने कमरे मे थे..... थोड़ी देर आराम करके आगे के यात्रा के लिए...।।

यह यात्रा मेरे ईष्ट और मां वैष्णो देवी का आशीर्वाद ही था.... कि इतनी कमजोर अवस्था में भी पूर्ण हुआ.... और ऐसा दर्शन भी....जो बिरलों को ही मिल पाता है।


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