गाँव की छाँव
गाँव की छाँव
चल दिए वे नग्न-पाँव
दूर अपने गाँव
सब कुछ उनका
था जैसे छिना
इसीलिए मन
था उनका अनमना
बहुत दिनों से
भूखे-प्यासे से
वे बेचारे !
किस्मत के मारे !
मिले रास्ते में उनको जो दयावान
उनके ही सहारे
आगे बढ़ते जाते
उनके किए अन्नदान से
पेट की क्षुधा मिटाते
साथ चल रहा बेटा उनका
दौड़ रहा आगे-आगे
रह-रहकर पीछे मुड़-मुड़
देख रहा वह मात-पिता को
दुधमुँही एक नन्ही बेटी
माँ के कांधे से है लिपटी
कुछ ही तो बस माह पहले
वह अभागी !
दीन-दुनिया में आई
दिन भर चल-चलकर हुए क्लांत
सड़क किनारे
धूल की बना सेज
नीले वितान के तले
लेटे थे होकर शांत
पर अंदर ही अंदर उनके
घुमड़ रहा था एक तूफान
सफर अभी काफी है बाकी
हो पाएगा कैसे पूरा
छिले-पाँव !
रोजी-रोटी छूटी
छूट गया ठाँव
पाने को बस शेष
गाँव की छाँव।
