मां की महिमा
मां की महिमा
सीने से लगा जो हर धड़कन में छिपी बात को
अपने शिशु की समझ लेती हैं,
उस मां को में क्या शब्दों में बयां करूं,
जो शब्दों के सार को एक पल में समझ लेती है,
मां की महिमा उस ख़ुदा से भी महान हैं,
जिसने यह संसार बनाया,
मां ने अपने शिशु के साथ गर्भ से ही अनोखा प्यार का रिश्ता निभाया,
मां ने अपने खून से सिंच कर एक एक पौधा उगाया,
उसे एक वटवृक्ष बनाने के लिए अपना पूरा जीवन लगाया,
भूल कर अपने को अपने शिशु में वह रम जाएं,
उसे उस में अपना कृष्णा और रहीम नज़र आएं,
मां की ममता लोरियां बन कानों में जब गूंजे,
आंखें फिर सपनों की गलियों में घूमे,
चांद भी बादलों में छिप कर सो जाएं,
पर मां सिरहाने पर बैठ लोरियां ही गाएं,
भूल थकावट को अपनी, पूरा दिन साखी बन
मन अपने शिशु का बहलाएं
पेट उसका भरने के लिए रोज - रोज नए तरीके आजमाएं,
कभी रोटी को चंदा मामा बता उसे खिलाएं,
तो कभी परियों की कहानी सुना- सुना कौर वह खिलाएं,
मां ही ईश्वर के प्रथम दर्शन अपने शिशु को कराएं,
बन गुरु, मां शिशु को ज्ञान से अवगत कराएं,
हर समस्या का समाधान उसकी,मां तुरंत बताएं,
हिम्मत और हौसला हर मां अपने शिशु को
घुट्टी में घोलकर पिलाएं,
जीवन के कठोर पथ पर चलने के लिए
मां शिशु को शूरवीर बनाएं ,
हर मंदिर - मस्जिद की दहलीज पर
मां अपने शिशु की खुशी की झोली फैलाएं,
फलता -फूलता देख कर संतान अपनी
मां हर गम को अपने भूल जाएं,
कामयाबी के लिए उसकी,
मां दुआओं की सीढ़ी बनाएं,
जीवन पूरा देकर अपना मां उसे एक इंसान बनाएं,
जब आंख मूदें अपनी संतान सामने चाहे,
ऐसी ममता को देख भगवान भी मां में समाएं,
मां के इस छोटे से शब्द में पूरी सृष्टि समा जाएं,
ऐसी मां की महिमा को कौन शब्दों में बांध पाएं,
मातृत्व के आगे जो नर -नारी अपना शीश झुकाएं,
उसे ईश्वर इसी धरती पर मिल जाएं।
