STORYMIRROR

Anup Kumar

Abstract Inspirational

4  

Anup Kumar

Abstract Inspirational

स्थिर धरा

स्थिर धरा

1 min
1.3K

गति-प्रगति पर लगा अंकुश 

ऐसे कुछ इंसान की

बदल बिल्कुल सी गई है 

सूरत ही जहान की

पहले हिलमिल रहते थे जो 


हैं मजबूर दूर रहने को

सदा धान्य-आपूरित थे जो 

विवश भूख भी वह सहने को

विप्लव कैसा है ये आया 


चारों ओर अंधेरा छाया

थमा-थमा सा जग है दिखता

रुका-रुका सा युग ये लगता

देख इसे लगता है ऐसे


छोड़ दिया हो जैसे घूर्णन ही पृथ्वी ने

आसमान की अलग-सी छटा !

चंदा दिखता गतिविहीन-सा !

वृक्ष लगे जो सड़क किनारे 


वे जंगल के वृक्षों का सा

लेकर एक एहसास खड़े हैं

अलग-थलग से देख नजारे 

ज्यों दुविधा के मध्य पड़े हैं

ऊब चुके हैं सभी चराचर 


बदली हुई जिंदगी जीकर

सुध-सी खोई है दुनिया ने 

जैसे कोई मदिरा पीकर

अब उद्विग्न हो चला है मन 

पाने को फिर वह ही धड़कन


सहज बन सके पुनः ये जीवन

लोटें खुशियां हर घर-आंगन।


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Abstract