स्थिर धरा
स्थिर धरा
गति-प्रगति पर लगा अंकुश
ऐसे कुछ इंसान की
बदल बिल्कुल सी गई है
सूरत ही जहान की
पहले हिलमिल रहते थे जो
हैं मजबूर दूर रहने को
सदा धान्य-आपूरित थे जो
विवश भूख भी वह सहने को
विप्लव कैसा है ये आया
चारों ओर अंधेरा छाया
थमा-थमा सा जग है दिखता
रुका-रुका सा युग ये लगता
देख इसे लगता है ऐसे
छोड़ दिया हो जैसे घूर्णन ही पृथ्वी ने
आसमान की अलग-सी छटा !
चंदा दिखता गतिविहीन-सा !
वृक्ष लगे जो सड़क किनारे
वे जंगल के वृक्षों का सा
लेकर एक एहसास खड़े हैं
अलग-थलग से देख नजारे
ज्यों दुविधा के मध्य पड़े हैं
ऊब चुके हैं सभी चराचर
बदली हुई जिंदगी जीकर
सुध-सी खोई है दुनिया ने
जैसे कोई मदिरा पीकर
अब उद्विग्न हो चला है मन
पाने को फिर वह ही धड़कन
सहज बन सके पुनः ये जीवन
लोटें खुशियां हर घर-आंगन।
