किसान
किसान
चल पड़ा एक हलधर
तारों की छाँव में
निर्जल व्रत लिए
करने धरती पर उपकार
ओस की बूंदें
चरण स्पर्श कर
मांग रही हैं मोक्ष वर
पक्षी समूह निकल पड़ा नीड़ों से
चल पड़ा सूरज को छूने
लौटेगा
शाम ढलने तक
खेत पड़ा सो रहा आकाश सा
जागा पांव की आहट से
एक छोर थामें
चल पड़ा मसीहा
धरती चीरने सृजन की
श्यामल तन तप रहा
दोपहरी में
बूंद बूंद पिघल रहा है सोना
मिट्टी में मिल उपजेगा कल
अमरत्व का सेवन कर
सुसता रहा
एक युग जैसा
एक पल का जीवन
चल पड़ा सोने को बोने
बीज बीज छिटकाकर
बैठा मेड़ पर
गणित लगाने
चली आ रही एक शाम अनोखी
उत्सुक करती उपकारी को
चला अर्धनग्न
गोधुलि में समाने
अपने कर्मों का लेखा ले
लौट रहे हैं
सुबह के पक्षी
बादल को करीब से छूने
थककर पहुंचा
घर आंगन में
चांद भी पहुंचा
तारों के दीपक ले
श्यामल तन की आरती करने
मरणासन्न में लेटा धरती पर
संचार हो रहा
अलौकिक शक्ति का
अगली सुबह फिर
चल पड़ा एक हलधर
तारों की छाँव में
निर्जल व्रत लिए
करने धरती पर उपकार।
