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Krishna Khatri

Abstract

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Krishna Khatri

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'इसके परे कुछ और नहीं !

'इसके परे कुछ और नहीं !

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जिन्दगी क्या है ?

जिन्दगी -

ईश्वर की पूजा है 

ख़ुदा की इबादत है 

गुरु का ज्ञान है 

मरियम का घर है

साधक की समाधि है 

आरती का दीया है 

ऐ बंदे मस्ती में इसे जलाए जा !


जिन्दगी -

महकता गुलो-गुलज़ार है

हुस्न 'औ' शबाब है 

इश्क की दास्तान है 

सुर्ख लबों की तबस्सुम है 

मस्ती भरी शराब है 

छलकता जाम है 

ऐ दिलाने झूमकर इसे पीये जा !


मगर नहीं

जिन्दगी महज़ -

ईश्वर की पूजा नहीं 

ख़ुदा की इबादत नहीं 

गुरु का ज्ञान नहीं

मरियम का घर नहीं 

साधक की समाधि नहीं

आरती का दीया नहीं

महकता गुलो-गुलज़ार नहीं 

हुस्न'औ'शबाब नहीं 

इश्क की दास्तान नहीं 

सुर्ख लबों की तबस्सुम नहीं 

मस्ती भरी शराब नहीं 

छलकता जाम नहीं 

जिन्दगी इसके परे -

कुछ और भी है ?


जिन्दगी -

भूख से बिलबिलाता बचपन है 

यौवन को तरसता यौवन है 

ग़रीबी की सताई जवानी है 

अभावों को ढोता बुढ़ापा है 

जलते रेगिस्तान का सूखा ठूंठ है 

तपते होंठों की प्यास है 

जिन्दगी - 

ऐसी भी है 

वैसी ही है 

जैसी भी है 

बस

एक हकीक़त है !

केवल एक हकीक़त -

इसके परे कुछ और नहीं !

      


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