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Chinmaya Kumar Nayak

Abstract

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Chinmaya Kumar Nayak

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बेबस साँसें

बेबस साँसें

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बेबस है साँसें 

खुद को छुपा रहा है खुली हवा से

जीवन तरसे

खुशियों को दिल से इजहार करने से


ये कैसी अनहोनी

जीवन की भय से आज जीवन है पानी

किसकी मनमानी

भरना पड़ रहा है किसकी ये करनी !


फिर भी धड़क रहा है

ये दिल जीने की आस में मचल रहा है 

जिंदगी तड़प रही है

सपनें फ़िर भी उमड़ रहे हैं।


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