STORYMIRROR

Gurpreet Kaur

Abstract

4  

Gurpreet Kaur

Abstract

ख़्याली पुलाव

ख़्याली पुलाव

1 min
392


कभी - कभी मन में ख्याल आता है कि

विदेश जाकर बस जाऊं

और अपनी पहचान बदल डालूं

मैं कौन हूँ, मेरा देश कौन - सा है

और मेरा किसी से क्या रिश्ता - नाता है

लेकिन फिर ख्याल आता है कि

ऐसा करने से मुझे

नया नाम, काम और इज़्ज़त तो मिल जाएगी

लेकिन मेरी पहचान कहीं खो जाएगी

और बिना पहचान के इंसानकी हालत 

उस ऊँचे वृक्ष की भांति हो जाती है

जिसके पास से लोग ऐसे गुज़र जाते हैं

जैसे उसके होने - न - होने से 

किसी को कोई फ़र्क़ ही ना पड़ता हो।



विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Abstract