मैं यूँ ही जिऐ जाता हूँ
मैं यूँ ही जिऐ जाता हूँ
नादान हूँ, उम्मीद वफा की
उस तंगदिल जमाने से, जो
जल जाऐ सुनकर फकत, मेरा
महफिल में नाम आने से
बेइंतेहा खाईं ठोकरें
फिर भी सीख नहीं पाता हूँ
भण्डार गमेां के लेकर दिल में
रोज ही तो पिऐ जाता हूं
कि हर एक जाम को
पैगाम-ऐ-गम एक दिऐ जाता हूं
अपनी ही धुन का पक्का
मैं यूँ ही जिऐ जाता हूं
शुक्रगुजार हूं मैं उनका,
हालात ये बना दिया
खुद हटकर उन्होंने बांहों से मेरी
शाकी को गले लगा दिया
अब छोड़ दर उनका मैं तशरीफ
अपनी घर शाकी के लिए जाता हूं
कि मैं यूं ही जिऐ जाता हूं
यूँ तो कम नहीं शराब भी
गमों से दो-चार होने को
कंधा बोतल का ही सही
सर अपना रख के सोने को
हमेशा ही तो निभाती है साथ
सुनती भी है मेरी बात
जो मैं किये जाता हूँ
कि मैं यूँ ही जिऐ जाता हूँ।
