पीर पराई
पीर पराई
मैं पीर पराई आँखों की
अपने कजरे की धार नहीं
तेरी राहों का पत्थर हूँ
तेरे हृदय का हार नहीं ।
ये अश्क नहीं तेरी यादों के
धारे ही बहते आते हैं
कुछ गिरते गोरे गालों पर
कुछ हर्फों को धो जाते हैं ।
ओ जाने वाले मुसाफ़िर सुन
दिल देता तुझको ये ही सदा
तिल-तिल मारे है तेरी जुदाई
चुन-चुन मारे हर कातिल अदा।
जो वादा तेरी साँसों ने
मेरी साँसों से चुपके था किया
मैं आज उसी पर जिंदा हूँ
उससे ही धड़के मेरा जिया।
