अभंग
अभंग
आला हा श्रावण । थोडासा हसरा
होऊन लाजरा । जणू वधू ---॥१॥
तप्त धरतीला । चिंब करायला
न्हाऊ घालायला। बरसे तो ---॥२॥
हसतो गालात। बहरे मनात
हिरव्या पानात । अंगोअंगी ---॥३॥
नभी कसा हसे । होऊन बेभान
सप्तरंगी बान । इंद्रधनु---॥४॥
मेहंदी रंगली। सख्याच्या प्रेमाची
कळी ती मनाची। खुललीया ---॥५॥
बासरीची धून। जन्माष्टमी सण
जमतील जन। उत्साहाने ---॥६॥
सृष्टी सारी नटे। होऊनी नवरी
जनु स्वप्नपरी। भूवरती ---॥७॥
