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Meena Mahindrakar

Abstract

3  

Meena Mahindrakar

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अभंग

अभंग

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आला हा श्रावण । थोडासा हसरा 

होऊन लाजरा । जणू वधू ---॥१॥


तप्त धरतीला । चिंब करायला 

न्हाऊ घालायला। बरसे तो ---॥२॥


हसतो गालात। बहरे मनात 

हिरव्या पानात । अंगोअंगी ---॥३॥


नभी कसा हसे । होऊन बेभान 

सप्तरंगी बान । इंद्रधनु---॥४॥


मेहंदी रंगली। सख्याच्या प्रेमाची 

कळी ती मनाची। खुललीया ---॥५॥


बासरीची धून। जन्माष्टमी सण 

जमतील जन। उत्साहाने ---॥६॥


सृष्टी सारी नटे। होऊनी नवरी 

जनु स्वप्नपरी। भूवरती ---॥७॥



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