Rajesh Chandrani Madanlal Jain

Drama Romance


4  

Rajesh Chandrani Madanlal Jain

Drama Romance


यशस्वी (9)

यशस्वी (9)

6 mins 78 6 mins 78

उस लड़के का नाम युवराज था। यशस्वी ने अपनी बुटीक में, दो तीन महीनों में उसके बार बार आने से, उस पर गौर किया था। बुटीक में पुरुष कम ही आते थे। अतः युवराज का आना, यशस्वी के ध्यान में आ जाने का कारण हुआ था। आरंभ में यशस्वी की युवराज से, लेन देन की बातों में ही, ऐसी भेंट खत्म हो जाया करती थी।

युवराज के बार बार आने से, यशस्वी क्रमशः उसकी बॉडी लैंग्वेज को पढ़ सकी थी। वह समझ गई थी कि युवराज, उसे लेकर विशेष सोच रहा है मगर, उन विचारों को शब्द नहीं दे रहा है।

यशस्वी को कक्षा 7-8 से, उसे पसंद करने वाले लड़के मिले थे। जो 'आई लव यू' तरह के कमेंट, स्कूल आने जाने के रास्ते में, पास किया करते थे। उनमें से, आसपड़ोस में कोई, उसके घर से बाहर दिखने की प्रतीक्षारत मिलता, तो कोई स्कूल या घर तक उसका पीछा किया करता था।

पढ़ाई पर ध्यान केंद्रित रखने वाली, यशस्वी ऐसी बात माँ को कहती तो, वे प्यार से समझातीं। कहतीं, तुम इनके चक्करों को अनदेखा करो, अच्छा पढ़ लोगी तो तुम्हें, बहुत ही योग्य लड़का मिलेगा, जो अभी अपने भविष्य निर्माण के प्रति अपना चित्त, एकाग्र कर रहा होगा। वह अपना समय, इन लड़कों जैसा, लड़कियों के पीछे पड़ने में, व्यर्थ नहीं कर रहा होगा। 

यशस्वी ने माँ की बात समझ ली थी। पहले वह पढ़ाई में तल्लीन रही। उसने किसी समय, अपनी 

असफलता में अवसाद के अधीन, आत्महत्या का प्रयास किया था। बाद में पापा के सहायक होने, फिर पापा के न रहने पर व्यवसाय एवं घर सम्हालने की जिम्मेदारी में, किशोरी से युवती हो जाने का अपना लड़कपन, अनुभव किये बिना ही बिता दिया था।

इस तरह से युवराज पहला युवक था, जिसकी आँखों में, अपने लिए प्यार को, उसके बिना कहे अनुभव किया था। युवराज की आँखों ने कही अनुभूति से, यशस्वी के हृदय में भी, प्रेम अँकुरित हुआ सा लगा था।

अपनी माँ की शादी करवाने के साथ ही यशस्वी ने, अपने बहनों की जिम्मेदारी अपने ऊपर ले ली थी। व्यवसाय अच्छा चल रहा था, जिसके लिए भी उसे ध्यान देना होता था। ये बातें उसे अनुमति नहीं देती थीं कि वह हृदय से मजबूर हो, अपने कदम बढ़ाये। उसे दिमाग से ही चलना था। अतः यशस्वी के हृदय में आकार ले रहा प्रेम का पौधा, अत्यंत धीमी गति से पनप रहा था।

फिर भी, एक दिन युवराज जब काउंटर पर पेमेंट करने आया तब, एक सामान्य वार्तालाप में यशस्वी ने, पहल कर उससे पूछ लिया - आप, क्या करते हैं ? 

युवराज ने बताया - मैं, इंजीनियरिंग कॉलेज में, मैकेनिकल के फाइनल सेमेस्टर में पढ़ रहा हूँ।

यशस्वी ने पूछा - आगे क्या करोगे?

युवराज ने बताया - अभी, कैंपस प्लेसमेंट के लिए, कम्पनीज आ रही हैं। उनमें जॉब के लिए हिस्सा ले रहा हूँ। 

यशस्वी ने, उसे शुभकामनायें दी थीं। फिर युवराज चला गया था। उसके बाद रात यशस्वी सोने के समय, सोच रही थी कि पहले, यशस्वी का सपना भी उसी इंजीनियरिंग कॉलेज में पढ़ने का था। अगर वह साकार हो सका होता तो यशस्वी भी, इस समय फाइनल सेमेस्टर में पढ़ रही होती।

यह विचार आते ही वह मन ही मन हँसी थी। यशस्वी के वहाँ पढ़ने पर उसे, प्यार करने वाला जो मिलता वह, युवराज उसकी शॉप पर आकर मिल रहा है। फिर मन में उसके प्रश्न उभरा था कि यह, कोई ईश्वरीय इक्छा तो नहीं? फिर वह नींद के आगोश में चली गई थी। 

तब दो महीने और, युवराज के नियमित अंतराल में, माँ अथवा बहन के साथ बुटीक में खरीदी के लिए आने का क्रम चला था। यशस्वी ने अलग से अपना प्यार प्रकट नहीं किया था। इतना मगर अवश्य किया था कि युवराज के आने पर, अपने सहायक के स्थान पर वह स्वयं, उन्हें ध्यान देकर उनका (युवराज की माँ या बहन का) सौदा दिया करती थी। 

दिन अच्छे बीत रहे थे, तब एक शाम युवराज अकेला आया था। उसने कुछ खरीदा नहीं था। कुछ उदास सा था। उसने बताया कि वह कल चंडीगढ़ जा रहा है। अतः जैसे अब आता रहा था वैसे, बुटीक पर नहीं आया करेगा। फिर उसने एक ग्रीटिंग एनवेलप, यशस्वी को दिया था। उस पर ऊपर 'हैप्पी फ्रेंडशिप' प्रिंट था। वह दिन यद्यपि फ्रेंडशिप डे नहीं था।

फेसबुक-व्हाट्सअप के आज के समय में युवराज-यशस्वी, आपस में यूँ नहीं जुड़े थे। युवराज का उससे प्रेम, पुराने संस्करण वाला प्रेम था।यशस्वी ने उसे हार्दिक शुभकामनायें कहा था।

युवराज के यहाँ से जाने की सूचना ने, यशस्वी को उदास कर दिया था। तब भी यशस्वी ने, कहा कुछ नहीं था। युवराज चला गया था। देखने की अपनी तीव्र इक्छा को दबाकर, यशस्वी ने बुटीक में लिफाफा नहीं खोला था। युवराज के जाने के बाद रह रह कर उस शाम, उसे उदासी घेर लेती थी। क्या होती है, प्रेम अनुभूति? इसे यशस्वी ने उस दिन भली-भाँति जाना था। रात्रि सोने के पहले, यशस्वी ने ग्रीटिंग खोली थी। प्रिंटेड ग्रीटिंग बहुत प्यारी थी। उसे सुखद आश्चर्य यह देख हुआ था कि उसमें, हस्तलिखित एक पत्र भी रखा था।

पढ़ने से पहले, उस पत्र को यशस्वी ने, अपने हृदय से लगाया था। फिर बिस्तर पर अधलेटे उसे खोला था। सादा रूप से - यशस्वी जी, नमस्ते के साथ पत्र प्रारंभ किया गया था। आगे लिखा था -

प्यार होना क्या होता है, यह मुझे, आपसे, आपकी बुटीक में देख-मिल कर अनुभव हुआ। इसे कहने के लिए, मैं सोचता था कि कैंपस में, अच्छे पैकेज के साथ, अच्छी कंपनी में चयन होने के बाद मैं, आपसे कहूँगा। आपने अपनी एक पोजीशन बनाई है। ऐसे में, स्वयं अर्निंग होने के पहले कहना, मैं उचित नहीं समझता था। अपनी हैसियत के बिना कहना मैं, आपके अनादर करने जैसा मानता था। 

प्यार होने का समय मगर थोड़ा ठीक सिध्द नहीं हुआ। यही समय, मेरे कैंपस प्लेसमेंट के टेस्ट/इंटरव्यू एवं फाइनल सेमेस्टर के एक्साम्स की तैयारी का था। यही समय, मेरे आपके योग्य बन सकने का था। मगर, मैं कुछ पढ़ने बैठता तो, किताब के पन्नों पर आपका चित्र उभर आता। पढ़ने की जगह मैं, आपके ख्यालों एवं आपको लेकर अपने दिवास्वप्न में खो जाता। परिणाम स्वरूप, एग्जाम में मार्क्स अच्छे रहते हुए भी मैं, कैंपस प्लेसमेंट में, सफल नहीं हो सका।

आपको, कहने की जल्दबाजी में न होना एवं शरीर में विचित्र सी सिहरन जिसमें, आपको अपने बाहुपाश में लेने की इक्छा जागती उसे भी नियंत्रण कर सकना, इससे मुझे, आपसे हुआ अपना एकतरफा प्यार, आत्मिक लगता है। 

आत्मिक प्यार, शारीरिक निकटता के बिना भी बना रहता है। आत्मिक प्यार में विशेषता होती है कि वह कुछ ले लेना नहीं अपितु सर्वस्व दे देना चाहता है।

साहस कर, मैं यह सब लिख रहा हूँ, आप बुरा न मानियेगा। मैं चंडीगढ़ जाकर अब मेरी पसंदीदा एक कंपनी में जॉब की कोशिश करूँगा। अगर आपके योग्य बन सका तो आपसे, मुझे लेकर, आप क्या सोचती हैं, यह जानने के लिए संपर्क करूँगा। 

हम कभी मिलेंगे या नहीं? आप मुझे लेकर प्यार अनुभूति रखती हैं या नहीं? इन प्रश्नों से विलग, इस जीवन में मेरा आत्मिक प्रेम बना रहेगा। जो अपने लिए कुछ पाने का नहीं, आपको देने का अभिलाषी रहेगा।मेरी माँ-बहन आपकी बुटीक कस्टमर बनी रहेंगी। मुझे लेकर यदि आप कोई, सॉफ्ट फीलिंग्स रखती हैं तो उसे भुला दीजियेगा। ऐसा नहीं है तो और अच्छी बात है। मन में आया इसलिए लिखा है।

अलविदा,

युवराज 

यशस्वी को पढ़कर धक्का सा लगा। बहनों की जिम्मेदारी के कारण उसे बुटीक चलाये रखना थी। वह अभी शादी कर भी नहीं सकती थी। उसने फिर दिल की जगह, दिमाग से काम लेना ठीक समझा। सोचा, युवराज को कोई और न मिली, मेरे जीवन में कोई और न आया एवं जीवन ने हमें, पुनः मिलाया तो ठीक अन्यथा युवराज से मेरा अव्यक्त प्रेम, युवराज की भाँति ही, आत्मिक प्रेम बना रहेगा। जिसे कोई जान और समझ न सकेगा।

ये सब बातें यशस्वी ने प्रिया को बताई थी। यह सब, प्रिया ने एक रात मुझे कहा था।

इसे सुन मैं, बाद में सोचता रहा कि वासनाओं से ऊपर उठ, प्रेम की परंपरा अभी भी जारी है यद्यपि इसे निभाने वाले बिरले बच रहे हैं .... 



Rate this content
Log in

More hindi story from Rajesh Chandrani Madanlal Jain

Similar hindi story from Drama