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Neha Yusuf

Abstract Drama Classics

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Neha Yusuf

Abstract Drama Classics

वो बिस्तर

वो बिस्तर

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मुझे याद आता है, वह गर्माहट लिए सलवटों वाला बिस्तर। जिसे छोड़ कर हर सुबह स्कूल जाना होता था। वही जिस पर गुज़री थी सारी रात सपनो में, जिस में उड़ा करती थी मैं पंख लगा कर। ख़ूबसूरत सा था घर पहाड़ो पर गुड़िया का, जहाँ जाती थी एक रेल बहुत से तोह्फ़े लेकर ।

इस खिड़की से जो धूप आती थी, मेरी तकरार थी उससे बड़ी। बैगैर पुछे घुसी चली आती थी कमरे में, और हर चीज़ पे उजाला फेक देती थी। बड़ी बेरुख़ी सी थी, वह भी। फिर हवा का तेज़ झोंख भी मुँह उठा कर चला आया अंदर, और उड़ा ले गया मेरे सिरहाने पड़े पंख अचानक से, मेरी गुड़िया भी कहीं बेसुद पड़ी रह गई।

वह कम्बल जिस ने लपेटा था मुझे रात भर, वह मेरे तलवो को जैसे भीच रहा था। बड़े मुश्किल से रखा था, अपना एक पैर ज़मीन पर, सर्द हवा ने उसको भी ठंडा कर दिया। घड़ी की सुइय ने मुझे इशार किया की जागो . मैंने अब चलना शुरू कर दिया था। रंग बिरंगे सपनो को छोड़ कर अकेला, काले सफ़ेद शब्दो में उलझी किताबो में जाने का समय आ गया था। स्कूल जाने का समय आ गया था।

आज तो फ़िक्र में गुज़र जाती है राते कई, अब कम्बल जो जकड़ता है पैरो को, अनसुनी कर देती हूँ हर बार मैं । गर्माहट बिस्तर की हो जाती है और मैं अब जैसे की कभी गरम ही नहीं थी। जैसे ही बजता घड़ी का अलार्म, सपने जो सिरहाने पड़े हुए थे तकिये के, जल्द ही भूल जाती हूँ। वह पहाड़ो पर सुन्दर घर, वह नीली आँखों वाली गुड़िया, मेरे पंख, कहीं गुम हो गए पता नहीं कहाँ। शायद इनहे मेरी याद नहीं आती अब। सीना तान कर खड़ा था मोटा पर्दा खिड़की पर, और धुप भी कहीं मुँह मोड़ कर खड़ी थी।

उलझे बालो का जुड़ा बांध कर हड़बड़ाहट में ,जो गई अपने बेटे की कमरे में आज, वह गर्माहट, वह सलवटे, सिरहाने में पंख,  सब वहीँ  पड़े हुए थे। मुझे देख कर पहचान गए सारे, हम आपस में मुस्कुरा दिए। लेकिन वो खिड़की से आती धूप अभी भी बेरुख़ी सी थी। आज स्कूल जाने की बारी उसकी थी, मेरे संगी साथी अब उसक बच
आज स्कूल जाने की बारी उसकी थी, मेरे संगी साथी अब उसके बचपन को पूरा करेंगे। ये अश्वासन मुझको आज मिला, जैसे मेरी सारी शिकायत दूर होगई।







 


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