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Neha Yusuf

Abstract Drama Classics

4  

Neha Yusuf

Abstract Drama Classics

आप कतार में है

आप कतार में है

3 mins
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पतिदेव सुबह सवेरे दफ्तर रवाना हो जाते , मुझे नींद से ना जगाने के लिए अकसर दबे पैर ही तैयार हो जाते। बच्चे अभी सो कर नही उठे थे। यह सुन्हेरा अवसर को पाते ही , कुछ मज़ेदार खाने का दिल करने लगा। फटाफट मुँह धोया , और ब्रश करते हुए सोचने लगी की नाश्ते में क्या बनाऊ। अक्सर जब घर में बच्चो का शोर न होता, मुझे अपना मनपसंद खाना पकाने और खाने में बड़ा सुकून मिलता। मैंने जल्दी से चाय बनाई और खूब सी हरी मिर्च और हरा धनिया वाला अंडा दो ब्रेड टोस्ट के साथ तैयार किया। आज सुबह से ही देव आनंद की गाने सुन ने का बड़ा मन हुआ। फ़ौरन इन्टरनेट से कुछ गाने ढून्ढ निकले और सुन ने लगी। थोड़ा सुकून से खाया ही था की, दोनों बच्चे मेरे सामने रोते हुए बिस्तर से उठ कर आ गये। मज़ेदार हरी मिर्च धनिये के अंडे का आखिरी कौर बड़े मुश्किल से मुँह में ठूस कर मैं हड़ बड़ा कर कुर्सी से उठी। और दोनों को अपने गले लगा कर चुप करा ने लगी। वह ब्रेड का आखरी टुकड़ा मेरे मुँह और हलक के बीच में ही घूम रहा था। दोनों बच्चो का भार मुझे निवाला निगलने ही नहीं दे रहा था।


शाम हो चली, पति देव अभी तक घर नहीं आये थे। बच्चे खेल रहे है, छोटा बेटा मुझसे बार बार अलग खिलौने लाकर उनके रंग बता रहा है। टी.वी पर " खिलौना " फिल्म चल रही थी , उस फिल्म के ईस्ट मन कलर देख कर मुझे अपना बचपन याद आ रहा था। यह वही फ़िल्मी गाने है जो दोपहर के वक़्त विविध भर्ती पर बजते थे। और हमारे रसोई से अरहर की दाल में पड़ा हींग ज़ीरे का छोंक मेज़ पर रखा पंखा, कमरे में खिंच रहा होता था। मैं अक्सर इन गानो पर डांस करने के लिए अपनी माँ से उनका दुप्पटा मांग लेती और अपनी फ्रॉक में उसको खोस कर खूब नाचती। आज भी मुझसे दुप्पटे मांगे जाते है पर मेरे दोनों बेटे उसको अपनी गर्दन में बांध कर सुपर मन बन जाते है।


बचपन की याद आते ही मेरा मन जैसे दुबारा सुकून में गोते खाने लगा , और अरहर की दाल , हरी चटनी ,घी के फुलको के साथ खाने का मन कर ने लगा। बहुत सी यादे जुडी हुई थी इस बचपन के खाने से, अपनी पसंद के चीज़ों को बस बनाने उठी थी की बच्चे पास्ता की ज़िद कर बैठे। यह क्या, अभी तो में बस सोच ही रही थी। फिर क्या, जल्दी से पास्ता बना डाला और बच्चो के सामने गरम गरम परोसा, बच्चे खुश हो कर जल्दी से डाइनिंग टेबल पर आ कर बैठ गए, अपनी प्लेट्स आगे बड़ाई और चॉव से खाने लगे। लेकिन मुझे अपनी अरहर की दाल ,घी की रोटी और हरी चटनी याद ही आती रही। पास्ता बनाने में कुछ उत्साह काम हो गया , और आलस आ गया ,फिर क्या, मज़बूरी में गिल गीले पास्ता के ठुकड़े ही मुँह में रख ने पड़े। पेट तो भर गया पर मन नहीं, तभी पति देव घर में पिज़्ज़ा का डब्बा लिए दाखिल हुए, शायद देर से आने का खामियाज़ा भर ने की नियत से उन्होंने सभो का पसन्दीदा खाना लाना ठीक समझा होगा। बच्चो के सुबह का टिफन का इंतेज़ाम हो गया था में खुश हो गई, लेकिन मेरा बचपन खाना अभी भी मेरे मन में बसा था। बेचारा अपने बनाने की राह देख रहा था


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